पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने नागरिकों से आग्रह किया कि वे गैर-आवश्यक स्वर्ण खरीद को स्थगित करें और पेट्रोलियम की खपत को कम करें, ताकि पश्चिम एशिया संकट के तीसरे महीने में प्रवेश करने के साथ भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को संरक्षित किया जा सके।
भारत के लिए स्वर्ण आयात क्यों महत्वपूर्ण है?
- भारत विश्व के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में से एक है। किंतु घरेलू उत्पादन नगण्य है, जिसके कारण देश को आयात पर अत्यधिक निर्भर रहना पड़ता है।
बढ़ता स्वर्ण आयात बिल
- वित्त वर्ष 2026 में भारत का स्वर्ण आयात तीव्रता से बढ़ा, यद्यपि भौतिक मात्रा कम रही, क्योंकि वैश्विक स्वर्ण कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई।
- मुख्य अवलोकन:
- वित्त वर्ष 2026 में स्वर्ण आयात मूल्य लगभग 25% बढ़ा।
- भौतिक आयात घटा, किंतु वैश्विक स्तर पर कीमतें 40% से अधिक बढ़ीं, जिससे आयात बिल फुला।
- यह दर्शाता है कि वस्तु मूल्य आघात, उपभोग में वृद्धि न होने पर भी, भारत के भुगतान संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
- अत्यधिक स्वर्ण आयात वैश्विक अनिश्चितता के समय एक सामूहिक आर्थिक चुनौती बन जाता है क्योंकि यह चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ाता है; विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है; रुपये का अवमूल्यन करता है; आयातित मुद्रास्फीति बढ़ाता है; और बाह्य क्षेत्र की संवेदनशीलता को और गंभीर करता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- चालू खाता घाटे (CAD) पर दबाव: स्वर्ण एक प्रमुख गैर-आवश्यक आयात वस्तु है।
- बढ़ते आयात व्यापार घाटे में वृद्धि करते हैं, विशेषकर जब तेल की कीमतें भी एक साथ ऊँची हों।
- उच्च CAD विदेशी पूँजी प्रवाह पर निर्भरता को बढ़ाता है।
- विदेशी मुद्रा भंडार पर तनाव: अधिक आयात भुगतान के लिए डॉलर का बड़ा बहिर्वाह आवश्यक होता है।
- यह भारतीय रिज़र्व बैंक की बाहरी आगह्तों के समय रुपये को स्थिर रखने की क्षमता को कम करता है।
- आरबीआई के आँकड़ों और सरकारी आकलनों के अनुसार, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखना आयात कवरेज, विनिमय दर स्थिरता एवं निवेशक विश्वास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- रुपये का अवमूल्यन: स्वर्ण और कच्चे तेल आयात हेतु बड़े पैमाने पर डॉलर की माँग रुपये को कमजोर करती है।
- अवमूल्यित रुपया आयात लागत को और बढ़ा देता है, जिससे मुद्रास्फीति का दुष्चक्र उत्पन्न होता है।
- मुद्रास्फीति का दबाव: स्वर्ण और तेल की बढ़ती कीमतें आयातित मुद्रास्फीति को बढ़ाती हैं।
- यह भारतीय रिज़र्व बैंक के लिए मौद्रिक नीति प्रबंधन को जटिल बना देता है।
भारत-यूएई CEPA और स्वर्ण आयात
- भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने फरवरी 2022 में व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर हस्ताक्षर किए, ताकि द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को सुदृढ़ किया जा सके।
- किंतु इस समझौते के कुछ शुल्क रियायतों ने अनजाने में बुलियन (परिष्कृत स्वर्ण) आयात को बढ़ा दिया।
- समझौते ने बुलियन और डोरे (अर्ध-शुद्ध स्वर्ण मिश्रधातु) के बीच अपेक्षित शुल्क अंतर को उलट दिया।
- परिणामस्वरूप भारत घरेलू परिष्करण के बजाय अधिक परिष्कृत स्वर्ण आयात करने लगा।
- आईआईएम अहमदाबाद के एक कार्यपत्र ने रेखांकित किया कि CEPA की शुल्क संरचना ने बुलियन आयात को डोरे की तुलना में अधिक आकर्षक बना दिया, जिससे घरेलू परिष्करण और मूल्य संवर्धन के अवसर घटे।
भारत का कमजोर स्वर्ण परिष्करण तंत्र
- भारत विश्व का सबसे बड़ा स्वर्ण उपभोक्ता होने के बावजूद वैश्विक स्वर्ण परिष्करण और व्यापार केंद्र के रूप में उभर नहीं पाया है।
- स्विट्ज़रलैंड और यूएई जैसे देशों ने नगण्य घरेलू उत्पादन के बावजूद सुदृढ़ परिष्करण तंत्र विकसित किया है।
- उन्होंने विश्वस्तरीय परिष्करण अवसंरचना, LBMA-मान्यता प्राप्त रिफाइनरी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से एकीकरण विकसित किया।
- परिष्करण लगभग 40% मूल्य संवर्धन उत्पन्न करता है, जिससे निर्यात के माध्यम से व्यापार घाटे की भरपाई होती है।
भारत के लिए चुनौतियाँ
- LBMA-मान्यता प्राप्त रिफाइनरी का अभाव: भारत में वर्तमान में वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त LBMA-प्रमाणित रिफाइनरी नहीं हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बुलियन बाजारों तक पहुँच सीमित हो जाती है।
- अव्यवस्थित क्षमता: वर्तमान रिफाइनरी नीतिगत और संरचनात्मक समस्याओं के कारण अपनी संभावित क्षमता से कम पर संचालित होती हैं।
- सीमित वैश्विक एकीकरण: भारत मुख्यतः एक अंतिम उपभोक्ता बना हुआ है, न कि वैश्विक स्वर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं में मूल्य संवर्धन करने वाला सहभागी।
- आयात संरचना पक्षपात: आयात तंत्र घरेलू प्रसंस्करण की तुलना में परिष्कृत बुलियन आयात को अधिक प्राथमिकता देता है।
सरकारी उपाय एवं नीतिगत सुझाव
- लघु अवधि के उपाय:
- माँग प्रबंधन: गैर-आवश्यक स्वर्ण खरीद को हतोत्साहित करना और वित्तीय बचत साधनों को प्रोत्साहित करना।
- आयात नियंत्रण: उच्च आयात शुल्क, स्वर्ण मुद्रीकरण योजनाएँ और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGBs) का उपयोग।
- दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार:
- परिष्करण तंत्र का विकास: LBMA-मान्यता प्राप्त रिफाइनरी स्थापित करना और घरेलू मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करना।
- स्वर्ण पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना: भारत में घरेलू स्तर पर बड़ी मात्रा में निष्क्रिय स्वर्ण भंडार उपस्थित है।
- वित्तीय विकल्पों का विस्तार: SGBs, गोल्ड ETFs और डिजिटल गोल्ड को प्रोत्साहित करना।
- CEPA शुल्क संरचना की समीक्षा: सुनिश्चित करना कि व्यापार समझौते घरेलू विनिर्माण और परिष्करण का समर्थन करें।
- बाह्य क्षेत्र की लचीलापन को सुदृढ़ करना: निर्यात का विविधीकरण, तेल पर निर्भरता कम करना और विदेशी मुद्रा प्रबंधन में सुधार।
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